प्रयागराज । शास्त्रीय नृत्य , प्राचीन नृत्य कला पर आधारित है। शास्त्रीय नृत्य, कला वह नृत्य रूप है जो सीखने वाले को प्राचीन भारतीय परंपरा से जोड़ती है। अधिकांश शास्त्रीय नृत्य रूपों की उत्पत्ति मंदिरों में हुई। भक्ति और आराधना शास्त्रीय नृत्य का मुख्य उद्देश्य था। नृत्य , संगीत की लय और ताल के अनुसार, नृत्य लयबद्ध तरीके से शरीर की गति विधि है। नृत्य एक विचार या भावना बोलने का तरीका है ।
यह विचार देवेन्द्र कुमार शर्मा ने वसेरा द्वारा अशोक नगर में राष्ट्रीय लोक संगीत नृत्य महोत्सव अभ्यास के दौरान, कलाकारों को संबोधित करते हुये बताया। आगे उन्होंने कहा कि भारत में शास्त्रीय नृत्य का बहुत महत्व है। शास्त्रीय नृत्य प्राचीन नृत्य कला पर आधारित है। भक्ति, शास्त्री नृत्य का मुख्य उद्देश्य था। बाद में, मनोरंजन के लिए दरबार में शास्त्रीय नृत्य किया जाने लगा ।18वीं और 19वीं शताब्दी में, ब्रिटिश उपनिवेशवाद कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य के रूपों से चकित था। ईसाई मिशनरियों ने मंदिरों में नृत्यांगनाओं को वेश्यावृत्ति और इसे एक कामोतेजक संस्कृति कहा और इस नृत्य संस्कृति को रोकने की मांग किया ।
वर्ष 1892 में एक "नृत्य-विरोधी आंदोलन" शुरू किया गया। इसलिए ब्रिटिश काल में शास्त्रीय नृत्य को उचित सम्मान नहीं मिला क्योंकि यह विलुप्तप्राय हो गयी थी। आज आवश्यकता है शास्त्रीय नृत्यों का प्रशिक्षण दिया जाय तथा इसका प्रदर्शन करके लोकप्रिय बनाने हेतु ब्यापक प्रसार प्रचार किया जाय। आज हमारे समाज मे पश्चिम संस्कृतियों तथा नृत्यों के कारण शास्त्रीय नृत्य पर ग्रहण लगता जा रहा है। अभ्यास में अंकिता मौर्या, प्रिया शान्ती, उन्नति गोस्वामी, सिद्धान्त शाहू तथा श्रेया सिंह ने भाग लिया ।





